आज का आधुनिक इंसान पैसे कमाने की अंधी दौड़ में इस कदर शामिल हो चुका है कि वह सही और गलत के बीच का बुनियादी फर्क ही भूल गया है।
बैंक बैलेंस बढ़ाने की चाह में इंसानियत, ईमानदारी और नैतिक मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। जब तिजोरी भरने की भूख बढ़ती है, तो इंसान दूसरों के दर्द के प्रति अंधा हो जाता है।भौतिक सुख-सुविधाएं हासिल करना गलत नहीं है,
लेकिन मानवता की कीमत पर अमीर बनना सबसे बड़ी दरिद्रता है। आज हम उस दौर में हैं जहां इंसान की कीमत उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसकी जेब से आंकी जा रही है। यही कारण है कि समाज में भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता पैर पसार रही है।
यह कलम हमें याद दिलाने का प्रयास है कि जो धन दूसरों का हक मारकर या अपनी आत्मा को बेचकर कमाया जाए, वह कभी तरक्की नहीं ला सकता। असली अमीरी नोटों की गिनती में नहीं, बल्कि जिंदा मानवता और साफ जमीर में होती है।
दीपतांश (Pen As Weapon)
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