आधुनिकता की अंधी दौड़: बुजुर्गों का अकेलापन और बिखरते सामाजिक ताने-बाने

आज हम जिस इक्कीसवीं सदी के आधुनिक, पढ़े-लिखे और विकसित समाज का हिस्सा होने का दावा करते हैं, उसकी नींव के नीचे एक बहुत कड़वी और दर्दनाक हकीकत दबी हुई है। यह हकीकत है।

हमारे घरों से बुजुर्गों की घनी छांव का गायब होना, उनका अंतहीन अकेलापन और आधुनिकता के नाम पर बिखरते हुए संयुक्त परिवार। शहरों की चकाचौंध, करियर की अंतहीन अंधी दौड़ और न्यूक्लियर फैमिली (छोटे एकल परिवारों) के बढ़ते चलन ने आज हमारे समाज के सबसे कीमती हिस्से यानी हमारे बुजुर्गों को अकेलेपन के एक ऐसे अंधेरे कोने में धकेल दिया है,

जहां उनके पास भौतिक सुख-सुविधाएं तो हो सकती हैं, लेकिन मन का हाल बांटने के लिए कोई अपना नहीं होता।एक समय था जब भारतीय समाज की पहचान उसके मजबूत पारिवारिक मूल्यों और संयुक्त परिवारों से होती थी। घर के आंगन में दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ी को संस्कार और जीवन की चुनौतियों से लड़ने का हौसला देती थीं।

बुजुर्गों का तजुर्बा पूरे परिवार के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता था। लेकिन आज की तथाकथित आधुनिक जीवनशैली ने उस आंगन को ही छोटा कर दिया है। ‘निजता’ (Privacy) और ‘पर्सनल स्पेस’ के नाम पर हमने जो दीवारें खड़ी की हैं, उन्होंने सबसे पहले हमारे अपने माता-पिता को ही हमसे पराया कर दिया है।

सच्ची तरक्की और सभ्यता वो कभी नहीं हो सकती जो हमें अपने ही अतीत, अपनी जड़ों और हमारे जन्मदाताओं से दूर कर दे। यह देखना बेहद चिंताजनक है कि युवा पीढ़ी करियर और आर्थिक समृद्धि की दौड़ में इतनी अंधी हो चुकी है कि उन्हें उन कांपते हाथों की सुध लेने का भी वक्त नहीं है, जिन्होंने कभी उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। कई बार तो बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता को केवल एक ‘जिम्मेदारी’ या ‘बोझ’ समझने लगते हैं, जो कि बेहद शर्मनाक और अमानवीय है।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं, वह उन्हीं बुजुर्गों के त्याग और कड़े संघर्ष की बदौलत है।जिस समाज या संस्कृति में बुजुर्गों का आदर, सम्मान और उनकी देखभाल नहीं होती, वह समाज अंदर से खोखला हो जाता है। पेड़ चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए, अगर वह अपनी जड़ों से कट जाए, तो उसका सूखना तय है।

पुरानी पीढ़ी का मार्गदर्शन, उनका अगाध प्रेम और उनका आशीर्वाद ही किसी भी परिवार और समाज की असली रीढ़ की हड्डी होता है। जब हम उन्हें अकेला छोड़ते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ रहे होते, बल्कि हम अपने समाज के इतिहास और तजुर्बे को खुद से दूर कर रहे होते हैं।

यह कलम, जो आज एक हथियार की तरह उठाई गई है, हमें इसी भूल को सुधारने की याद दिलाने का एक छोटा सा प्रयास है। हमें करियर की दौड़ में आगे जरूर बढ़ना चाहिए, लेकिन अपनों को पीछे छोड़कर नहीं। असली विकास और आधुनिकता तब है जब हमारी नई और वैज्ञानिक सोच के साथ बुजुर्गों का पुराना और समृद्ध तजुर्बा दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलें।

जब घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य के चेहरे पर मुस्कान होगी, तभी हमारा समाज वास्तव में विकसित और सुखी कहलाएगा। आइए, अपने व्यस्त जीवन में से थोड़ा समय निकालकर उनके पास बैठें, उनकी बातें सुनें और उन्हें यह अहसास दिलाएं कि वे आज भी हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

दीपतांश (Pen As Weapon)

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