आज हम जिस इक्कीसवीं सदी के शिखर पर खड़े हैं, उसे तकनीकी क्रांति का स्वर्ण युग कहा जाता है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने पूरी दुनिया को हमारी उंगलियों के पोरों पर लाकर समेट दिया है। भौगोलिक दूरियां मिट चुकी हैं और सात समंदर पार बैठा व्यक्ति भी अब सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है।
लेकिन इस अभूतपूर्व तकनीकी विकास के समानांतर, एक बहुत ही डरावनी और कड़वी हकीकत हमारे समाज के भीतर जन्म ले चुकी है। जैसे-जैसे हमारी वर्चुअल (आभासी) दुनिया बड़ी होती जा रही है, वैसे-वैसे हमारी असल दुनिया सुकड़ती जा रही है।
आज हमारे पास सोशल मीडिया पर ‘फ्रेंड्स’ और ‘फॉलोअर्स’ की गिनती तो हजारों-लाखों में है, लेकिन जब मन उदास हो या जीवन में कोई संकट आए, तो कंधे पर हाथ रखकर यह कहने वाला कोई नहीं होता कि ‘घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।’इस डिजिटल चकाचौंध ने हमारे समाज को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां इंसान अपनी पहचान भूलकर केवल एक ‘यूज़र’ बनकर रह गया है।
सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हमारी ज़िंदगी स्क्रीन के इर्द-गिर्द घूमती है। हम किसी हसीन वादी का लुत्फ उठाने जाते हैं, तो हमारा ध्यान वहां की ताज़ा हवा और शांति को महसूस करने पर नहीं, बल्कि उस पल को कैमरे में कैद करके ‘रील’ या ‘पोस्ट’ बनाने पर होता है। हमने यादों को संजोना छोड़ दिया है और उनकी जगह ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ की संख्या को अपनी खुशी का पैमाना बना लिया है।
यह एक बेहद गंभीर मानसिक बीमारी का रूप लेता जा रहा है, जहां इंसान की पूरी आत्म-संतुष्टि दूसरों के वर्चुअल अप्रूवल (स्वीकृति) पर टिक गई है।सबसे दुखद पहलू यह है कि इस आभासी जुड़ाव ने हमारी वास्तविक संवेदनाओं को कुंद कर दिया है। आज अगर सड़क पर किसी का एक्सीडेंट हो जाता है, तो वहां मौजूद भीड़ पीड़ित की मदद करने के बजाय अपने मोबाइल से वीडियो बनाने में मशगूल हो जाती है।
यह संवेदनशीलता का सबसे निचला स्तर है। इंटरनेट पर किसी सामाजिक मुद्दे या त्रासदी पर ‘हैशटैग’ चलाकर दुख प्रकट करना बहुत आसान है, लेकिन धरातल पर उतरकर किसी भूखे को खाना खिलाना या किसी पीड़ित की आंसू पोंछना बहुत कठिन हो गया है।
हमारी कलम आज इसी पाखंड पर प्रहार करने के लिए उठी है। हम डिजिटल रूप से जितने ज़्यादा कनेक्टेड (जुड़े हुए) दिख रहे हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही अलोन (अकेले) होते जा रहे हैं।यह नकली दुनिया हमारी युवा पीढ़ी के सामाजिक ताने-बाने को भी तहस-नहस कर रही है। पारिवारिक बैठकों और त्योहारों का स्थान अब व्हाट्सएप ग्रुप्स ने ले लिया है।
एक ही घर के एक ही कमरे में बैठे चार लोग आपस में बात करने के बजाय अपने-अपने फोन में डूबे रहते हैं। संवाद का यह अभाव रिश्तों में ऐसी गहरी खाइयां पैदा कर रहा है जिन्हें भर पाना नामुमकिन होता जा रहा है। लोग अवसाद, अकेलेपन और एंग्जायटी (घबराहट) के शिकार हो रहे हैं, क्योंकि उनके पास अपनी वास्तविक भावनाओं को साझा करने के लिए कोई सुरक्षित और सच्चा मंच नहीं है।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चमकती हुई ज़िंदगी के पीछे अक्सर एक रोता हुआ और अकेला दिल छिपा होता है।वर्चुअल दुनिया के इस मायाजाल से बाहर निकलना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी मानसिक और सामाजिक भलाई के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। हमें तकनीक का इस्तेमाल अपनी सुविधा के लिए करना चाहिए, न कि खुद को तकनीक का गुलाम बना देना चाहिए।
असली ज़िंदगी उस स्क्रीन के बाहर है, जहाँ प्रकृति की सुंदरता है, अपनों के साथ चाय की चुस्कियाँ हैं, बच्चों की बेबाक हँसी है और बुजुर्गों का अनमोल तजुर्बा है।’Pen As Weapon’ के माध्यम से हमारा प्रयास इसी सोई हुई मानवीय चेतना को जगाना है। शब्दों की यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हम अपनी खोई हुई संवेदनाओं को वापस नहीं पा लेते।
आइए, आज से एक संकल्प लें कि दिन में कुछ समय के लिए उस जादुई स्क्रीन को बंद करेंगे और अपने आसपास के लोगों को समय देंगे। आइए, रील की दुनिया से निकलकर रीयल (असली) दुनिया को जीना शुरू करें, क्योंकि इंसान मशीनों से नहीं, अपनी भावनाओं और संवेदनाओं से मुकम्मल होता है।
दीपतांश (Pen As Weapon)
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