हम जिस आधुनिक और विकसित दुनिया में जी रहे हैं, वहां इंसानी सहूलियत के लिए विज्ञान ने कई आविष्कार किए हैं। इन्हीं आविष्कारों में से एक है ‘प्लास्टिक’—जिसने शुरुआत में तो हमारी ज़िंदगी को बेहद आसान और सस्ता बना दिया, लेकिन आज वही प्लास्टिक हमारे पूरे ग्रह के लिए एक विनाशकारी ‘भस्मासुर’ साबित हो रहा है।
सुबह उठकर दांत साफ करने वाले ब्रश से लेकर रात को दूध की थैली या पानी की बोतल तक, हमारी सुबह से लेकर शाम तक की पूरी दिनचर्या प्लास्टिक के घेरे में कैद हो चुकी है। लेकिन इस सहूलियत की आड़ में हम जिस भयानक संकट को न्यौता दे रहे हैं, वह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को ही मिटाने पर आमादा है।
प्लास्टिक संकट की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिसे हम ‘सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ (एक बार इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक) कहते हैं, उसे बनाने में कुछ मिनट लगते हैं, हम उसका इस्तेमाल मात्र कुछ सेकंड या मिनटों के लिए करते हैं, लेकिन उसे इस धरती से पूरी तरह नष्ट होने में 500 से 1,000 साल का समय लग जाता है।
इसका सीधा मतलब यह है कि इंसानी इतिहास में आज तक जितना भी प्लास्टिक बनाया गया है, उसका एक-एक कण आज भी किसी न किसी रूप में इस धरती पर मौजूद है। हमारे शहरों के बाहर खड़े कचरे के विशाल पहाड़, दम तोड़ती नदियाँ और प्लास्टिक से पटे पड़े समंदर इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि हमने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति का गला घोंट दिया है।
यह समस्या सिर्फ सड़कों पर बिखरे कचरे या दृश्य प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन चक्र के भीतर तक प्रवेश कर चुकी है। जब प्लास्टिक कचरा धूप और पानी के संपर्क में आकर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है, तो वह ‘माइक्रोप्लास्टिक’ का रूप ले लेता है। यह माइक्रोप्लास्टिक हमारी मिट्टी में मिल रहा है, नदियों के जरिए हमारे पीने के पानी में घुल रहा है और समुद्री जीवों के पेट से होते हुए हमारे भोजन की थाली तक पहुँच रहा है।
हाल ही में हुए वैज्ञानिक शोधों में इंसानी खून और यहाँ तक कि नवजात बच्चों के शरीर में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि हम अनजाने में ही सही, लेकिन रोज़ थोड़ा-थोड़ा ज़हर खा रहे हैं।’Pen As Weapon’ के माध्यम से हमारी कलम आज इसी गहरी संवेदनहीनता पर प्रहार करने के लिए उठी है।
सरकारें नियम बनाती हैं, प्लास्टिक पर बैन (प्रतिबंध) लगाती हैं, लेकिन जब तक एक आम नागरिक के तौर पर हमारी चेतना नहीं जागेगी, तब तक कोई भी कानून इस भस्मासुर को नहीं रोक सकता। हम बाज़ार में सब्जी लेने जाते समय घर से कपड़े का थैला ले जाने में शर्म महसूस करते हैं, लेकिन प्लास्टिक की थैलियों में भरा हुआ कचरा सड़कों पर फेंकने में हमें कोई हिचक नहीं होती।
यह वैचारिक खोखलापन ही पर्यावरण विनाश की सबसे बड़ी वजह है।इस संकट से उबरने का अब केवल एक ही रास्ता बचा है।हमें अपनी जीवनशैली में क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। हमें ‘रिड्यूस, रीयूज़ और रीसाइकिल’ (कम उपयोग, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण) के सिद्धांत को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखकर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा।
शादी-ब्याह और सामाजिक आयोजनों में प्लास्टिक के डिस्पोजल बर्तनों की जगह पारंपरिक पत्तलों और मिट्टी के कुल्हड़ों को वापस लाना होगा।यह शब्दों की लड़ाई केवल पन्नों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, इसे एक जन-आंदोलन बनना होगा।
आइए, आज इस मंच के माध्यम से खुद से एक गंभीर वादा करें कि हम सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का बहिष्कार करेंगे और अपनी धरती माँ को इस ज़हरीले फंदे से आज़ाद कराने में अपना छोटा सा योगदान देंगे। याद रखिए, यदि आज हम प्रकृति को नहीं बचाएंगे, तो कल प्रकृति हमें बचाने के लिए नहीं बचेगी। असली आधुनिकता और समझदारी प्रकृति के विनाश में नहीं, बल्कि उसके संरक्षण में है।
दीपतांश (Pen As Weapon)
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