आज के दौर में आम आदमी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह हर पांच साल में पोलिंग बूथ पर जाकर एक नई उम्मीद चुनता है, लेकिन बदले में उसे सिर्फ खोखले वादे, छलावा और गहरी निराशा मिलती है।
आधुनिक राजनीति आज जनसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता, रसूख और मुनाफे का एक ऐसा संगठित व्यवसाय बन चुकी है, जहां मोहरा सिर्फ और सिर्फ देश की आम जनता को बनाया जाता है। नेता मंचों पर हाथ जोड़कर लोकतंत्र की दुहाई देते हैं,
लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि आम भारतीय का इस पूरी राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास अब पूरी तरह से उठ चुका है।
लोकतंत्र के नाम पर छलावा और टूटता विश्वास
चुनाव आते ही देश का सियासी पारा चढ़ने लगता है। बड़े-बड़े होर्डिंग्स, महंगे विज्ञापन और चमचमाते मंचों से लोक-लुभावन वादों की झड़ी लगा दी जाती है। कहीं मुफ्त बिजली-पानी का लालच दिया जाता है, तो कहीं लाखों नौकरियों और चाक-चौबंद सुरक्षा के खोखले दावे किए जाते हैं।
लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आते हैं और सत्ता की कुर्सी सुरक्षित होती है, ये सारे वादे ‘चुनावी रणनीति’ और ‘जुमलों’ का हिस्सा बनकर सरकारी फाइलों के नीचे दफन हो जाते हैं।जनता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, और इसके पीछे कई ठोस कारण हैं
महंगाई का चौतरफा हमला:
सुबह की चायपत्ती से लेकर रात के खाने के तेल तक, हर बुनियादी चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल और दवाइयों की कीमतें आम आदमी के बजट को पूरी तरह ध्वस्त कर चुकी हैं। मध्यम वर्ग और गरीब परिवार की आमदनी या तो घट रही है या जस की तस है, लेकिन खर्चे दोगुने हो चुके हैं।
बेरोजगारी का दंश:
देश के लाखों-करोड़ों युवा महंगी डिग्रियां हाथों में लेकर रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। सरकारी नौकरियों की भर्तियां सालों-साल लटकी रहती हैं, पेपर लीक के घोटाले आम हो चुके हैं, और निजी क्षेत्र में छंटनी का दौर जारी है। युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ देश की सबसे बड़ी त्रासदी है।
भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें:
बड़े नेता भले ही भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा करें, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी एक आम नागरिक को राशन कार्ड बनवाने, जमीन की रजिस्ट्री कराने या एक छोटा सा सरकारी प्रमाण पत्र लेने के लिए भी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और रिश्वत देनी पड़ती है।
टैक्स का बोझ और जनता से खुली लूट
एक तरफ जहां कॉरपोरेट घरानों और बड़े उद्योगपतियों के लाखों-करोड़ों रुपये के कर्ज को ‘एनपीए’ (NPA) या ‘राइट ऑफ’ के नाम पर माफ कर दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पर टैक्स का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है।
देश का हर नागरिक, चाहे वह अमीर हो या एक दिहाड़ी मजदूर, सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हर सुई और माचिस पर भी भारी-भरकम टैक्स (GST) चुकाता है।अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार की झोली में डालने के बाद भी, बदले में आम जनता को क्या मिलता है?
बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था:
सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छुपी नहीं है। वहां इलाज और दवाइयों के नाम पर सिर्फ लंबी कतारें और अव्यवस्था मिलती है। गंभीर बीमारी की स्थिति में गरीब आदमी या तो कर्ज के जाल में फंस जाता है या इलाज के अभाव में दम तोड़ देता है।
जर्जर शिक्षा व्यवस्था:
सरकारी स्कूल और कॉलेज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों और आधुनिक संसाधनों की भारी कमी है। नतीजतन, अभिभावक मजबूरी में अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं, जो शिक्षा के नाम पर व्यापार चला रहे हैं।
घटिया बुनियादी ढांचा:
मानसून की एक ही बारिश में हमारे शहरों की चमचमाती सड़कें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। हर साल खराब इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से हजारों मासूम लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। हर साल पुलों का गिरना और सड़कों का धंसना इस बात का सबूत है कि जनता का पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।यह आम आदमी की जेब पर दिन-दहाड़े की जा रही खुली लूट नहीं तो और क्या है?
नफरत और ध्रुवीकरण की सोची-समझी राजनीति
राजनीतिक दलों और उनके आकाओं ने सत्ता में बने रहने का एक बहुत ही आसान शॉर्टकट ढूंढ लिया है—’बांटो और राज करो’। जनता जब अपने बुनियादी अधिकारों जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और रोजगार पर सवाल पूछने लगती है, तो राजनीति का रुख तुरंत बदल दिया जाता है।
अचानक से टीवी डिबेट्स और चुनावी रैलियों में जाति, धर्म, मंदिर-मस्जिद और राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत का जहर घोला जाने लगता है।नेताओं द्वारा समाज को आपस में इस तरह लड़ा दिया जाता है कि लोग अपनी वास्तविक समस्याओं को भूलकर एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। जब तक जनता इस चाल को नहीं समझेगी, तब तक बुनियादी मुद्दों पर बात होना नामुमकिन है।
निष्कर्ष:
अब मौन तोड़ने और जागने का वक्त हैलोकतंत्र में जनता ही देश की असली मालिक होती है। सरकारें हमारे वोटों से बनती हैं और हमारे ही पैसों (टैक्स) से देश चलाती हैं। इसलिए नेताओं को भगवान या सर्वशक्तिमान मानना बंद करना होगा। जब तक हम नेताओं और पार्टियों से उनके कामकाज का हिसाब नहीं मांगेंगे,
जब तक हम जाति और धर्म की अंधी पट्टियों को उतारकर अस्पताल, स्कूल और रोजगार के नाम पर वोट देना तय नहीं करेंगे, तब तक यह लूट और छलावा इसी तरह जारी रहेगा।
यदि हम आज भी चुप रहे और इस व्यवस्था के सामने घुटने टेक दिए, तो हमारी आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। लोकतंत्र को बचाने और अपनी जेबों को लुटने से बचाने के लिए अब आम आदमी को जागना होगा, जागरूक बनना होगा और सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछना होगा।
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