इक्कीसवीं सदी के इस दौर में अगर आपसे कोई कहे कि आप गुलाम हैं, तो शायद आप तुरंत प्रतिवाद कर उठेंगे। हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं, हमारे पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और हम अपनी मर्जी से जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन यदि इस स्वतंत्रता की परत को थोड़ा सा हटाकर देखा जाए, तो एक बेहद खौफनाक और कड़वा सच सामने आता है। आज का आधुनिक मानव जाने-अनजाने में एक ऐसी गुलामी का शिकार हो चुका है, जिसकी न तो कोई बेड़ियाँ हैं और न ही कोई जेलर। यह गुलामी है—’डिजिटल गुलामी’। हमारी जेब में रखा हुआ वह छोटा सा स्मार्टफोन, जिसे हम अपनी सहूलियत का साधन समझते थे, आज उसने हमारी सोच, हमारे समय और हमारी पूरी चेतना को अपने नियंत्रण में ले लिया है।
सुबह आँख खुलने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक, हमारा जीवन स्क्रीन के नोटिफिकेशन से तय होता है। हम जागते ही सबसे पहले ईश्वर का नाम या प्रकृति का सौंदर्य नहीं देखते, बल्कि अपने फोन की स्क्रीन पर यह चेक करते हैं कि किसी अनजान व्यक्ति ने हमारी तस्वीर पर क्या प्रतिक्रिया दी है। क्या यह मानसिक गुलामी नहीं है कि हमारे दिन की शुरुआत और हमारा मूड इस बात से तय होता है कि इंटरनेट की आभासी दुनिया में हमें कितने ‘लाइक्स’ या ‘व्यूज’ मिले? तकनीक का उद्देश्य मनुष्य के जीवन को आसान बनाना था, लेकिन आज तकनीक ने मनुष्य को अपना एक ऐसा उपभोक्ता बना दिया है जो बिना सोचे-समझे बस स्क्रीन को स्क्रॉल (Scroll) किए जा रहा है।
इंटरनेट की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम को इस तरह डिज़ाइन किया है कि वे इंसानी दिमाग के डोपामाइन (Dopamine) सिस्टम से खेल सकें। हर बार जब आप स्क्रीन को नीचे खिसकाते हैं, तो आपको एक नया वीडियो, एक नई खबर या एक नया रील्स (Reels) दिखाई देता है। यह बिल्कुल एक कैसीनो में खेले जाने वाले जुए की तरह है, जहाँ इंसान को हमेशा यह उम्मीद होती है कि अगली बार कुछ बेहतर मिलेगा। इस अंधी लत का सबसे बुरा असर हमारे देश के युवाओं पर पड़ रहा है। उनकी एकाग्रता की अवधि (Attention Span) घटकर कुछ सेकंड्स की रह गई है। वे गंभीर किताबें पढ़ने, गहरे वैचारिक मुद्दों पर बात करने या वास्तविक दुनिया के रिश्तों को समय देने के बजाय, 15 सेकंड के रील्स में अपनी जिंदगी के बेशकीमती घंटे बर्बाद कर रहे हैं।
इस वैचारिक पतन का परिणाम यह हो रहा है कि समाज से मौलिक सोच गायब होती जा रही है। हम वह नहीं सोच रहे हैं जो हम सोचना चाहते हैं, बल्कि हम वह सोच रहे हैं जो सोशल मीडिया की फीड हमें दिखाना चाहती है। राजनीतिक पार्टियाँ, विज्ञापन कंपनियाँ और बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स इस डिजिटल गुलामी का फायदा उठाकर बहुत आसानी से जनमानस की विचारधारा को बदल रहे हैं। इंटरनेट पर परोसा जा रहा फेक न्यूज़ और नफ़रत का एजेंडा इसी गुलामी की उपज है। जब आपकी सोचने की क्षमता पर किसी और का नियंत्रण हो जाए, तो समझ लीजिए कि आपकी आज़ादी केवल एक भ्रम है।
‘पेन एज़ वेपन’ (Pen As Weapon) का यह हमेशा से संकल्प रहा है कि हम व्यवस्था और समाज की इन कड़वी सच्चाइयों पर अपनी कलम की धार से प्रहार करते रहें। हमारी कलम कोई बिकाऊ खिलौना नहीं है, बल्कि यह इस मानसिक और डिजिटल गुलामी के खिलाफ एक हथियार है। हमें इस आभासी दुनिया के मायाजाल से बाहर निकलना होगा। हमें फिर से प्रकृति से जुड़ना होगा, अपने परिवार के साथ बैठकर बिना फोन के चाय पीनी होगी, और सबसे बड़ी बात—खुद से संवाद करना सीखना होगा।
अगर हम आज भी सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल स्क्रीन की गुलाम बनकर रह जाएंगी, जिनके पास उंगलियाँ तो होंगी स्क्रॉल करने के लिए, लेकिन एक आज़ाद दिमाग नहीं होगा सच को देखने के लिए। इस वैचारिक आंदोलन को ज़िंदा रखने के लिए और आज़ाद आवाज़ों को मजबूती देने के लिए हर जागरूक पाठक का सहयोग अनिवार्य है। आइए, इस डिजिटल गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें और अपनी सोच को पुनः आज़ाद बनाएं।
दीपतांश (Pen As Weapon संपादकीय)